मन-आंगन आज
रोशनी से नहा रहा है
चांद शरद का गा रहा है
सुनो ना,
झर रही है अमृत बूंदें
सो गई मैं आंखें मूंदे
तुम नहीं क्यों अब तक आए
चांद शरद का तुम्हें बुलाए
सुनो ना,
केशरी चंदन घुला है
आसमान भी धुला-धुला है
नर्म रेशम का हिंडोला है
सुनो ना,
चांद से गपशप करो ना
आंचल में तारे भरो ना
हवा का हर सुर गुनो ना
मेरे लिए
चांद और चांदनी को
बस, कुछ देर
सुनो ना...