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चार पावस रचनाएँ

डॉ. पुष्पा रानी गर्ग

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ND
* आम्रपाली बरखा
झर झर
चढ़ा रही है सुमन
बूँदों के
तथागत के चरणों में,
करुणा, सतरंगी
छा गई है
आकाश में
इंद्रधनुष बन कर!
****

* मेघ,
हाथों में कंदील लिए
निकल पड़े हैं
आकाश में
दिखा रहे हैं राह
रात्रि की अभिसारिका को
जो खोज रही है
अपने चाँद को
धरती पर।
****

* बादलों ने फिर
छेड़ दी है
रिमझिम की शहनाई
स्वप्न की शकुन्तला
यौवन की देहरी पर
प्रेम की पुस्तक का
पहला पृष्ठ
पढ़ आई।
****

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ND
* सूरज, अश्व चढ़े
दुष्यंत-सा
विचर रहा है,
कल्पना के वन में
बादल
उत्तरीय ये
उड़ रहे हैं आकाश में,
अब पावस
लिखने ही वाला है
नया महाकाव्य
प्रेम का।

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