सीमा सिंघल
नजर से नजर मिलने का कसूर इतना ही होता,
दीवारे कितनी भी उठाए कोई एतराज नहीं होता।
आ गया जो दिल किसी पे तो क्या करेंगे आप,
इश्क को देखिए हुस्न का मोहताज नहीं होता।
जोश,और जुनून का आलम होता है दिल में हरदम,
कदम कितना भी आहिस्ता उठे बेआवाज नहीं होता।
चाहत नाम है वफ़ा का,ये जज्बा,नेमत है खुदा की,
छुपाए कोई कितना भी पर यह राज नहीं होता।
राजा रंक न जाने ये,जात-पाँत न माने यें,चाहत में,
मानो तो कोई किसी का 'सीमा' सरताज नहीं होता।