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जब-जब मानसून बरसा

फाल्गुनी

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जब-जब मानसून बरसा
उसके साथ बरसे तुम
तुम्हारी यादें
तुम्हारी बातें
और मेरी आँखें।

जब-जब मानसून बरसा
उसके साथ बरसा मेरा वजूद
भीगा मेरा मन
और बढ़ उठी तपन।

जब-जब मानसून बरसा
उसके साथ बरसी
तुम्हारी तीखी बातों की किरचें
मन में जहाँ-तहाँ उग आई
बिन मौसम की मिरचें।

मानसून नहीं बरसा है यह
इसके साथ, बस बरसे हो तुम
कैसे बरसता मानसून
जब मेरी मन-धरा से तुम हो गए हो गुम।

चेतावनी : इस कविता का अन्यत्र कहीं प्रकाशन प्रतिबंधित है। इस्तेमाल करने पर कानूनी कार्रवाई होगी। फाल्गुनी की समस्त कविताएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। फीचर संपादक, वेबदुनिया

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