क्यों गूंज रहे हैं दिग-दिगंत।
क्यों उछल रहे मुद्दे अनंत।।
बदनाम हुआ क्यों नाम 'संत'।
कब होगा पाखंडों का अंत ।।1।।
जरा सोचो तो!
राजनीति-धर्म की घाल-मेल ।
बरसती लक्ष्मी के घिनौने खेल।।
नैतिकता हुई शोबाजों की रखैल।
आमजन उदार, सब रहा झेल ।।2।।
जरा सोचो तो!
इक्कीसवीं सदी में भी (घोर) अंधविश्वास ।
शास्त्रों को मिला अज्ञातवास।।
श्रद्धाएं छुपी मन्नतों के आसपास।
नई पीढ़ी को लगने लगा सब बकवास ।।3।।
जरा सोचो तो!
श्रद्धा सीता का हो रहा हरण।
निष्ठा की द्रोपदी चीख रही।।
(राम गये हैं स्वर्ण-मृग के पीछे।)
पांडव बैठे कर नयन नीचे ।।)
कोई तो बचाओ रे इनको।
रक्षा की मांग ये भीख रहीं ।।4।।
जरा सोचो तो!
या कह दो सब बीमार हैं हम।
चुप रह कर हिस्सेदार हैं हम।।
जो रोता है उसे रोने दो।
ये भव्य तमाशे होने दो।।
श्रद्धा को पाखंड खा जायेगा।
तो कौन सा प्रलय आ जायेगा ।।5।।
(क्या यही सोच है ?)
गर तंत्र-मंत्र का पाखंडी।
कोहरा यों ही गहरायेगा।।
(भोली) अबलाओं का यो ही शोषण होगा
और धर्म रसातल जाएगा ।।6।।
(पर) न्याय की नजर में समाजघात के
गर सच्चे पैमां होंगे।
कई बैठे हैं जो ऊंचे मंचों पर
वे 'उस घर' के मेहमां होंगे ।।7।।
(आमीन!)