बिखरे पड़े हैं कागजात जैसे एक अबोध के बिखरे बाल, जिन्हें वह हाथों से कंघीनुमा फेरकर, कभी-कभी ठीक करने की कोशिश करता और फिर माँग का चीर कहीं ओर से निकल आता। उड़ रहे हैं कागज यहाँ-वहाँ, कोई टेबल के नीचे जा गिरा है, कोई फर्श पर बिखरा पड़ा है, सोचती हूँ कई बार इन्हें स्टेपलर से एक ही जगह स्टेपल करके बंडल बना लूँ .... फिर याद आ जाती है जिंदगी के बिखरे कागजों की और उम्र के इस पड़ाव पर भी जब हाथ में है डॉक्टर की डिग्री लेकिन सूखे पत्ते की तरह इधर से उधर लुढ़कती जिंदगी। काश इसे भी स्टेपल कर पाती ...... उलझनों व संघर्षों के पन्ने एक बंच में और माँ की दुआओं की लिस्ट एक बंच में।