अशोक गीते
वहम गर ये तूने भी पाला न होता
कभी जुगनुओं से उजाला न होता
कि क्या होता इन सर्द रातों में तेरा,
तेरे पास गर ये दुशाला न होता
कि बैठे ही रहते किनारे पे अब हम
जो दरिया में क़श्ती को डाला न होता
कि फौलाद बनता जिगर कैसे अब ये
जो साँचे में दर्दों को ढाला न होता
जो बंदिश न होतीं यूँ कविता पे इतनी
तो ये सच है कोई 'निराला' न होता ।
साभार : प्रयास