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जुगनुओं से उजाला न होता

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ग़ज़ल
अशोक गीते
WDWD
वहम गर ये तूने भी पाला न होता
कभी जुगनुओं से उजाला न होता

कि क्या होता इन सर्द रातों में तेरा,
तेरे पास गर ये दुशाला न होता

कि बैठे ही रहते किनारे पे अब हम
जो दरिया में क़श्ती को डाला न होता

कि फौलाद बनता जिगर कैसे अब ये
जो साँचे में दर्दों को ढाला न होता

जो बंदिश न होतीं यूँ कविता पे इतनी
तो ये सच है कोई 'निराला' न होता

साभार : प्रयास

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