अब आई है ठंड अपने पंखफैलाकर घर की चौखट सजी है धूप के टुकडों से। दादी बैठी खटिया पर,मालिश का तेल लेकरदादाजी कम्बल ओढे बैठे हैं,टीवी के सामनेनन्हा पानी को देखकर,सर पर रजाई ओढ़करफ़िर सो गया। पापा टीवी के सामने बैठकर हाथ में पेपरलेकर चाय पर चाय गुड़क रहे है दीदी फटाफटतैयार हो गई है कॉलेज जाने के लिएमाँ फिरकनी सी कभी पराठे सेंकतीकभी हलवा बनाती। तरस गई है कुनकुनी धूप के लिए मैं भी कब तक बचूँगा,पढाई करने केबहाने बैठा रहकर
नहाकर
नहीं गया तो कक्षा के
बाहर कर दिया
जाऊँगा
तब बरामदे से
फ़िर ठंडी हवा मेरे कानों को चूमेगी
इससे अच्छा है मैं इस ठंड का
स्वागत उसके पंखों को
छूकर कर लूँ।