विद्या गुप्ता
बुनी गई थी
वह चादर भी
रेशा-रेशा
जैसे, बुनी जाती है सब
यू ही उघड़ गई/बगैर ओढ़े
रेशा-रेशा बुनी चादर का
होना, न होना ही था
जैसा नहीं था
सड़क और पैर के बीच
मंजिल जैसा कुछ
उनके पास
नहीं होती, सपनों की जाति
सोने के पहले/ या जागते गुनतारों में
क्या सोचते होंगे वे।
भूत भविष्य वर्तमान
किसी सीढ़ी पर रखकर पैर
रखेंगे दूसरी सीढ़ी पर पाँव।
दोषी कौन!
कहाँ हुई, कैसे हुई?
राज-पाट के अनुपात में चूक
कोढ़ से अवांछित हो उठा
पृथ्वी का सौंदर्य
नर मादा/दो अहम कर्त्ता
सृष्टि के दोनों ध्रुवों के बीच
कहाँ खड़ा होगा वह
इतिहास भूगोल /उत्थान पतन
सब नकारा, सब बेमानी
कोरा केनवास पकड़े
बगैर चेहरे की जाति
कहाँ करेगी हस्ताक्षर
नसों में
बहता तो होगा कोहराम
खल खल बहता काम
रीत जाता होगा
फिर जमीन में ही
कौई जान पाएगा?
बगैर मुहाने की नदी का दर्द।