स्मृति
तुम
तुम कभी
मुझे समझ नहीं सकें
इसीलिए
मैं और तुम
कभी हम नहीं बन सकें।
मैं
मैं कभी
तुम्हारी नहीं हो सकी
क्योंकि
हर वक्त आड़े आ गया
मेरा 'मैं' और तुम्हारा ' मैं' ।
हम
हम 'हम' कभी नहीं हो सकें
क्योंकि हम इसी 'वहम' में रहें कि
हमारा 'अहम' नहीं रहा ।
जबकि हर बार हम में 'व' और 'अ' रहा।
वहम और अहम 'हम' कैसे हो सकते हैं?