मेरा शरीर एक खोखा है
जिसमें एक खाका खींचा है
आँखें, चेहरा, हाथ, पैर, दिल
उसमें छिपे अनेक उद्गार
सागर की तरह छलाँगे मारते
पता नहीं किस चित्रकार ने खींचा है यह खाका
वृक्ष का एक पत्ता दूसरे से मेल नहीं खाता
फिर भी देखती हूँ अपनी आँखों में तुमको
तुम्हारी आँखों में अपने को
भिन्नता के बावजूद
नहीं जानती मेरे दूसरे भागों में भी
सूर्य का प्रकाश वैसा ही पड़ता है।
साभार : अक्षर पर्व