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तुलसी-गंध जैसी मां

अजहर हाशमी

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कविता
स्नेह की निर्मल नदी-
निर्बंध जैसी मां
कर्म की क्यारी की
तुलसी-गंध जैसी मां
युग-युगों से दे रही
कुरबानियां खुद की
कुरबानियों से शाश्वत
अनुबंध जैसी मां
जोड़ने में ही सदा
सबको लगी रहती
परिवार के रिश्तों
में सेतुबंध जैसी मां
फर्ज के पर्वत को
उंगली पर उठाती है
कृष्ण-गोवर्धन के
इक संबंध जैसी मां
सब्र की सूरत
वचन अपना निभाती है
भीष्म की न टूटती
सौगंध जैसी मां
शाकंभरी, दुर्गा हो
या देवी महाकाली
अन्याय, अत्याचार
पर प्रतिबंध जैसी मां
वो मदर मेरी, हलीमा हो
या पन्ना धाय
प्यार, सेवा, त्याग
के उपबंध जैसी मां
मां के पांवों के तले
जन्नत कही जाती
भागवत के सात्विक
स्कंध जैसी मां।

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