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आँख में भूख थी, और हाथ में बंदूक थी।साथ उसके विनाश था, और काँपती किसी की रुह थी। वो लड़ रहा था, अपने आपसे।न्याय के वास्ते।न्याय की छाँव भी,धूप से तेज थी।छोड़ आया था वह खून के रिश्ते।खून के लिए उसके हाथों में मौत थी।
उसे ना पता था, वह कर रहा भूल था। भूल भी उसको अब, लग रही उसूल थी।मारता-काटता वह फिर रहा अचेत-सा। चेतना तो अब उसे लग रही त्रिशूल थी। (
यह रचना नक्सलवाद पर लिखी गई है।)