परवीन कुमार अश्क
सेहरा सेहरा मुझ को पीने आता है
मेरा समंदर सेहरा होता जाता है
रात की छत पर अंधी माँ रस्ता देखे
चाँद को लेकर बालक कब घर आता है
मेरे शहर में साठ बरस का इक बूढ़ा
बच्चों के घर में दीवार उठाता है
अंदर मिट्टी सोना होती जाती है
बाहर सोना मिट्टी होता जाता है
दिल के जख्म पर मरहम काम नहीं करते
दिल के जख्म पर बोसा रक्खा जाता है
रोज शाम को छुपने से पहले ए 'अश्क'
सूरज मिरा चराग जला कर जाता है।