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दीप तू अब रोशन हो

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दीप जंगल हेमज्योत्सना नीलगगन साहित्य
हेमज्योत्सना 'दीप'
ND
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दीप तू अब रोशन हो,
घनघोर अँधेरे या,
जंगल सा बिहड़ मन हो ,
दीप तू अब रोशन हो।

इन्तज़ार नहीं अब कर,
किरणों के सो जाने का,
माना वक्त नहीं ये,
सूरज के खो जाने का।

डर मत अब तू,
अब बस तू उज्जवल हो जा,
अब तो तू,
नीलगगन सा निश्छल हो जा।
जल-जल कर,
किरणों का नव जाल बना लें,
कण-कण को ,
नव-सूरज का एहसास करा दें।
दीप तू अब रोशन हो।

घनघोर अँधेरे या
जंगल सा बिहड़ मन हो
दीप तू अब रोशन हो।

कहाँ भरा विष चन्दन में,
संग सर्पो के रह कर
महक उठे ये वन अँधियारा,
कुछ चन्दन सा कर।

फिर खिल उठे
सायों के फूल,
दीप तू अब,
किरणों का नव-गुलशन हो।
दीप तू अब रोशन हो,
घनघोर अँधेरे या ,
जंगल सा बिहड़ मन हो ,
दीप तू अब रोशन हो।

कौन है कहता,
ठोकर लगने पर ही संभलो
अँधियारा होने पर ही उज्जवल हो,

अँधियारा होने से पहले
दीप तू अब रोशन हो,
घनघोर अँधेरे या,
जंगल सा बिहड़ मन हो ,
दीप तू अब रोशन हो।

दे दिलासा तपते सूरज को,
दे दिलासा डरते मन को,
नव-रोशनी की तुलिका से,
हर रंग को नव-जीवन दे।
टूट चुका है ग़र कोई,
जीवन जीने का नव ढंग दे
खत्म तेरा विश्राम हो,
शुरु तेरा अब काम हो।

दीप तू अब रोशन हो,
घनघोर अँधेरे या,
जंगल सा बिहड़ मन हो,
दीप तू अब रोशन हो।

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