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देखती हूं अपनी आंखों में तुझको

- चम्पा वैद

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हिन्दी कविता
FILE
मेरा शरीर एक खोखा है
जिसमें एक खाका खींचा है
आंखें चेहरा हाथ पैर दिल
उसमें छिपे अनेक उद्गार

सागर की तरह छलांगे मारते
पता नहीं किस चित्रकार ने खींचा है यह खाका

वृक्ष का एक पत्ता दूसरे से मेल नहीं खाता
फिर भी देखती हूं अपनी आंखों में तुझको

तुम्हारी आंखों में अपने को
भिन्नता के बावजूद

नहीं जानती मेरे दूसरे भागों में भी
सूर्य का प्रकाश वैसा ही पड़ता है।

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