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जितेंद्र चौहान
मैं धूल हूँ
इस शहर की उड़ती हुई
मुझसे बचने के लिए
मुँह पर रूमाल बाँध लेते हैं लोग
छींटते हैं पानी
घर और दुकान के बाहर
दरवाजों-खिड़कियों में
लगाई जाने लगी हैं जालियाँ
मैं तो इसके बाद भी
जहाँ जाना होता है
चली जाती हूँ
आने-जाने वालों को
भला कोई रोक सका है
मुझे क्या रोक सकोगे तुम
मैं तो धूल हूँ
इस शहर की
उड़ती हुई।