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पिता, तुम क्षमा करना

दिनकर सोनवलकर

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दिनकर सोनवलकर
ND
अब कोई नहीं आता
घर के पारंपरिक उत्सव में।

जहाँ कभी जुड़ते थे मेले
वहाँ अब सिर्फ पिता
और सबसे छोटा लड़का
दोनों विवश, अकेले
अलग-अलग संसार में जीते हुए।

बाकी लड़के व्यस्त हैं
अपनी-अपनी गृहस्थी में
अपनी-अपनी पत्नी को 'देवी'
और बच्चों को 'अवतार'
मानते हुए।

सच पूछिए तो
उनको अब उस पुराने ईश्वर से
सरोकार नहीं रहा।

फिर महँगाई ने भी
नाक में दम कर रखा है
बीवी-बच्चों को
रोटी-कपड़ा दें
या आरती उठाएँ?

उनके नए अनुभव संसार हैं
यद्यपि अवचेतन में कहीं
गहरे बज उठते
संस्कारों के तार हैं।

फिर उत्सव भी तो रह गया है
महज औपचारिकता
न हँसी के ठहाके हैं
न संगीत के स्वर।

रिश्तों के गहरे अहसास से
पिघल कर
आँसू बन जानेवाला
खून भी हो गया है पतला।
उसमें भर गया है जहर
नौकरी की विवशता
छोटे-छोटे स्वार्थों
खुद के अहंकार का।

सभी जैसे असहाय हो गए हैं
व्यवस्था में फंस कर।
औपचारिकताएँ निभाने का
साहस भी नहीं रहा उनमें।

पिता, तुम क्षमा करना
कि हम सम्मिलित नहीं हो सके
उत्सव में-
लेकिन
मस्ती में डूबकर
झाँझें बजाता हुआ
तुम्हारा प्रेरक-बिंब
हमारी आँखों में बराबर
चमक रहा है।

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