शोभना चौरे
सपने सजाती रही रात भर
पर आँखों से नींद दूर रही
ह्रदय विकलता के आँसू बहाता रहा
पर आँखें मेरी सूखी रही
लुटती रही अपनों के बीच
बाजार में मंदी छाई रही
शब्द मुखर होते रहे
भावना शून्य हो जुड़ते रहें
संदेस पर संदेस आते रहें
पर पुकार सुनने को तरसती रही
आकाश चाँद-सितारों से
सजता रहा रात भर
मेरी सेज सूनी रही।