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ग्रॅब्रिएला मिस्त्राल
मैंने पहले कभी
देखा नहीं था
पृथ्वी का सच्चा बिंब
पृथ्वी दिख रही जैसेकि एक स्त्री
लिए हुए बाँहों में अपना बच्चा
अब मैं जानती हूँ
कैसे उपजता है चीज़ों में मातृत्व भाव
पहाड़ जो मेरी ओर नीची निगाह डालता है
एक माँ है और दुपहरी को
उसके कंधों और घुटनों पर
धुँध खेलती है बच्चे की तरह
अब याद आती है मुझे
घाटी में वह दरार
अपने गहरे बिछौने में गाता हुआ जल
मैं उसी दरार की मानिंद
करती महसूस अपने भीतर गाते इस नन्हे
नटखट को
क्योंकि दी है मैंने उसे अपनी
माँस-मज्जा
अनुवाद- नरेंद्र जैन
(पहल की पुस्तिका ‘पृथ्वी का बिंब’ से साभार)