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प्रताप सोमवंशी की गज़लें

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प्रताप सोमवंशी
(एक)

ND


गमछे बिछा के सो गईं घर की जरूरतें,
जागे तो साथ हो गईं घर की जरूरतें।

रोटी के लिए उसका जुनूँ दब के मर गया,
बचपन में ही डुबो गईं घर की जरूरतें।

जिन बेटियों को बोझ समझता था उम्र भर,
काँधों पे अपने ढो गईं घर की जरूरतें।

उस दिन हम अपने आप पे काबू न रख सके,
जिस दिन लिपट के रो गईं घर की जरूरतें।

उनमें हुनर बहुत था और हौसला भी था,
देहरी में जाके खो गईं घर की जरूरतें।

(दो)

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SubratoND


कोशिशें चाहे हम हजार करें,
मुश्किलें घर पे इंतजार करें।

ये मुसाफिर किधर से अब जाएँ,
रास्ते-रास्तों पे वार करें।

बस इक सवाल लेके सब घूमें,
ये बता किस पे ऐतबार करें।

उनको मालूम है जो शिकार हुए,
चाहतें हमको हैं बीमार करें।

(तीन)

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SubratoND


दर्द औरों का हम उठाए हैं,
रात-दिन यूँ ही तो बिताए हैं।

क्या मिला सोचते तो मर जाते,
बस निभाएँ हैं तो निभाए हैं।

हर किसी से निबाह लेते हो,
आपकी कितनी आत्माएँ हैं।

वे हैं मेधा, मदर टेरेसा हैं,
बेटियाँ मत कहो कि गाएँ हैं।

सच ने हर दौर में ये देखा है,
झूठ के पाँव निकल आए हैं।

(चार)

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SubratoND


थोड़ी अच्छी खराब है साहेब,
जिन्दगी एक किताब है साहेब।

उसको पहचान नहीं पाओगे,
साथ रखता नकाब है साहेब।

वो शराफत की बात करता है,
उसकी नीयत खराब है साहेब।

पाँव के काँटे ने ये बतलाया,
इस गली में गुलाब है साहेब।

सारी अच्छाइयाँ हैं बस तुझमें,
कैसा उलटा हिसाब है साहेब।

(पाँच)

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Praveen BarnaleND


कुछ अचंभे कुछ अजूबे घर हमारे देखिए.
सब के ऊपर हो गए नौकर हमारे देखिए।

देखकर अपनी ही परछाईं को यारों चौंकना,
किस तरह घर कर गया है डर हमारे देखिए।

उड़ के दिखलाऊँगा मैं भी सिर्फ इतना ही कहा,
जड़ से ही कतरे गए हैं पर हमारे देखिए।

खोलकर नन्ही-सी मुठ्ठी एक बच्चे ने कहा,
किसने रखे हाथ पर पत्थर हमारे देखिए।

अपनी ही चीखें नहीं पड़ती सुनाई अब यहाँ,
अब यहाँ तक दब गए हैं स्वर हमारे देखिए।

(छह)

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SubratoND


हरा इक पेड़ काटा जा रहा है,
हमें प्रतिशत में बाँटा जा रहा है।

इधर दीवार ऊँची हो रही है,
उधर खाई को पाटा जा रहा है।

तुम्हारे हौसले बढ़ने लगे हैं,
तुम्हारा नाम छाँटा जा रहा है।

बता आया है कि पापा हैं घर में,
उसे जोरों से डाँटा जा रहा है।

हमारे हाथ में हथियार देकर,
हमारा हाथ काटा जा रहा है।

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