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फगुनी बयार

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-अखिलेश पाण्डेय

बह चली फगुनी बयार,
साथ ले खुशियाँ अपार
किंशुक ने बिखेरी सुर्ख छटा,
आम भी बौरों से पटा
महुए ने घोली मदमस्ती,
बाबा में भी छाई मस्ती
सेमल भी पीछे नही रहा,
वो भी इन सबके संग बहा
फैली है चारों ओर खुशी,
राधा, मोहन, लीला या शशी
कृषक बंधु खुश देख अनाज,
गाते फाग हाथ ले साज
रस घोल रहे हैं फागुन गीत,
चाचा के ठुमके संग सुमीत
फागुन में सबकी अपनी मस्ती,
चीजें महँगी हों या सस्ती
सब भूल गए हैं अपना गम,
सब में है भरा हुआ दम।

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