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फिर एक सपने की तलाश है

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सपना
रेखा भाटिया
ND
खत्म हुई मुश्किलें, खो गई मंजिलें,
अब आता नहीं सकून दिल को,
एक सपना था मेरा टूटा कभी,
और बह गई आस आँसुओं में,
वो जगमगाता सपना कभी चमका करता था,
इन नयनों के साए में,
खामोश-सा साथ चल पड़ता था संग मेरे,
भीतर ही भीतर मुझसे बतियाता,
शक्ति-संचार करता जब वो हँस पड़ता था,
काली रातों के गहरे साए में दीप बन जला करता था,
उसके साए में हमेशा धूप-वर्षा से आँख-मिचौली खेला करती थी,
कठिन राहों और मुश्किलों पर खूब हँसा करती थी,
बादलों पर चलती हवा में तैरा करती थी,
जागे-जागे लम्हों में खोई-खोई रहती थी,
फिर अचानक इक बवंडर उठा,
उस आवेग ने मेरा सपना छीना
छटपटाते जख्म रह गए सीने में,
यादों के इस खँडहर में उन लम्हों ही महक आज भी जिन्दा है,
वो एक पल था जब जी भर जीवन जिया था मैंने,
सूनी आँखों को आज फिर एक ऐसे सपने की तलाश है।

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