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फूल-फूल पर बैठना

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शिव योगी
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उनका

उतना ही पुराना संसार

सृजन की श्रृंखलाओं का

जितना भी विस्तार

प्रेम करने की

जितनी भी

पुरानी हो परिभाषाएँ

तितलियों में

गहरी घनी

उज्जवल सजल है प्रत्याशाएँ

जब भी कभी

खिला होगा

धरती पर

पहला पहला फूल

तितलियों ने

तान दिए होंगे

सतरंगी दुकूल

सब जगह हैं वे

यहाँ वहाँ तहाँ

घाटी दर्रे

चोटियों पर

वृक्षों-पौधों

पत्तियों पर

निरापद है

ति‍तलियों का

फूल-फूल पर बैठना

मिट जाती है वे

उड़ते उड़ते निशंक

उनके नहीं होते डंक

तितलियाँ

ब्रह्मांड में

नाद है अनहद

वे नहीं चुनती शहद

वे सृष्टि का सौष्ठव

सौंदर्य का सार

वे महीनों सालों

युगों युगों तक

करती रही

वासंतिक छटाओं के

महकने का इंतज़ार

तितलियाँ घुमक्कड़ है

तितलियाँ पियक्कड़ है

प्रकृति का उपहार

वे बाँटती हैं प्यार

साभार : संबोधन

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