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फूलों से खुशबू ही गायब

- शहनाज़ सुल्तान अहमद

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लेखिका 08
NDND
फूलों से खुशबू ही गायब, ऐसा अक्सर लगता है
इसमें मौसम की साजिश है जिससे अब डर लगता है।


चिड़िया सोने की है लेकिन अल्लसुबह बोलेगी क्या
उसका पिंजरा तो देखो पूरा मुर्दाघर लगता है।


पाँव झुलसते गर्म रेत में, प्यास तड़पती पानी को
इस महफिल पर आकर देखो कौन सा मंजर लगता है।


खुशहाली की बेल सुनहरी घाटी में ही फैली रही
मेरे सपनों की धरती का टुकड़ा बंजर लगता है।


हर चेहरे पर चीख थमी है, दहशत का सन्नाटा है।
हर सीने में चुभा हुआ सा कोई खंजर लगता है।


तपकर गहरी आँच में रफ्ता-रफ्ता कुंदन बन जाता
आग हुई ठंडी तो बंदा बद से बदतर लगता है।


फूलों से खुशबू ही गायब ऐसा अक्सर लगता है।

साभार : लेखिका 08

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