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बच्चे और फूल - दो

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कविता
- रवि कुमा

NDND
बच्चे उदास है
उनके जादुई पिटारे में सहेजे फूल
मुरझा गए हैं
नहीं शायद
वे सोच रहे हैं कि मर गए हैं

वे सदमे में हैं
कल्पनालोक घायल है
रंग खो गए हैं कहीं
खुशबुएँ सड़ांध मारने को है

सारी चेतावनी और नसीहतें
उनकी आँखों में उतर आए पानी में
फूलों और तितलियों के साथ
बेतरतीबी से चिलक रही हैं

जादुई पिटारे की रहस्यमयी दुनिया
कुछ समय के लिए खामोश हो गई है

बच्चे आखिरकार बच्चे हैं
फूलों को फिर से देखते ही
कौंध उठती है उनकी आँखों में वही चमक
उनके कल्पनालोक में
उन्हें सहेजने के
नये-नये इंतजामात कुलबुलाने लगते हैं

वे फिर से
नजरे बचाकर पहुँच जाना चाहते हैं
फूलों और तितलियों के पास

कुछ सिरफिरे कहते हैं
फूलों और खुशबुओं को सहेजना
आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है
इस दुनिया को बचाए रखने के लिए।

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