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बनजारे हैं पहाड़ के बादल
काव्य-संसार
सुदर्शन वशिष्ठ
बनजारे हैं पहाड़ के बादलपहनाते हैं पहाड़ पेड़-पौधों को बंगें एकदम ढाल लेते चोटी ढलान खेत खलिहान के आकार। बंगें, जो निशानियाँ हैं सौभाग्य की सुहाग की बादल की ये बंगें टूटें न कभी पहाड़ से बादल रूठें न कभी।