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बहुत तप चुके देवता

दोहे गर्मी के

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दोहे गर्मी के
ओम वर्मा
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अभिशापित थीं कुंतियां, अभिशापित हम लोग।
सूर्य तुम्हारे तेज को, सभी रहे हैं भोग॥

कुछ के पीछे लू लगी, कुछ के साहूकार।
डाल अँगोछा कर रहे, दोनों ही प्रतिकार॥

ठंडक है टॉकीज में, चाहे पिक्चर बोर।
यूं भरपाई कर रहा, अब फिल्मों का दौर॥

अबके वह गर्मी पड़ी, पड़ी न पिछली बार।
हर गर्मी में बोलते, ऐसा क्यूं सब यार॥

बहुत तप चुके देवता, अब तो जाओ मान।
फिर से ग्रस ले ना कहीं, पवनपुत्र हनुमान॥

कुछ ऐसे यह रोहिणी, झुलसा गई शरीर।
ब्रज में ज्यों राधा जले, मथुरा में यदुवीर॥

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कुछ ज्यादा ही कर रही, 'जेठ' दुपहरी तंग।
जनता वधु को मेघजी, दो वैधानिक संग॥

कुछ पल ही दुबके रहे, तुम बादल की ओट।
लोकलुभावन घोषणा, थी लेने को वोट॥

बड़े बजट में राहतें, ज्यों देती सरकार।
यही लगा जब जेठ में, देखी कहीं फुहार॥

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