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बिखर गया हूँ फ़साने की तरह

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साहित्य
रोहित जै
NDND
ग़मों ने बाँट लिया मुझको ख़ज़ाने की तरह
बिखर गया हूँ हर गली में फ़साने की तरह

मुझे कुछ इस तरह से ढ़ूँढ़ रही है गर्दिश
के जैसे मै हूँ शिकारी के निशाने की तरह

के रात रात न हो, कोई चिता हो जैसे
के जैसे ख़्वाब हों जलने के बहाने की तरह

मै कोई संग न था मै तो एक शीशा था
पटक दिया मुझे पत्थर पे ज़माने की तरह

ये वहम ये ख़लिश ये वफ़ा-मिजाज़ ज़ेहन
इन्होंने कर दिया 'रोहित' को दीवाने की तरह।

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