धूप की सारी ऊर्जा समेट लूँ समेट लूँ चाँदनी की सारी मिठास पी लूँ वर्षा की स्वाति बूँदें चमकूँ स्वाति-सुत-सा विपरीत बर्फानी हवाओं में बन जाऊँ पहाड़ी काठी-सा वज्र सह लूँगा माटी के गर्भ में सृजन की सारी यातनाएँ
तुम अपने हाथों से पोचल* की गाँठ में अपने बरामदे की बाँस झिम पर सिंदूरी मक्की के भुट्टे-सा बाँध लेना मुझे बीज बन जाने के लिए।