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बीज बन जाने के लिए

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साहित्य
-तेजराम शर्मा
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धूप की
सारी ऊर्जा समेट लूँ
समेट लूँ चाँदनी की सारी मिठास
पी लूँ वर्षा की स्वाति बूँदें
चमकूँ स्वाति-सुत-सा
विपरीत बर्फानी हवाओं में
बन जाऊँ पहाड़ी काठी-सा वज्र
सह लूँगा माटी के गर्भ में
सृजन की सारी यातनाएँ

तुम अपने हाथों से
पोचल* की गाँठ में
अपने बरामदे
की बाँस झिम पर
सिंदूरी मक्की के भुट्‍टे-सा
बाँध लेना मुझे
बीज बन जाने के लिए।

* भुट्‍टे के बाहर का आवरण

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