विश्व-युद्ध की विभीषिका ने नामो-निशाँ मिटाए थे, हिरोशिमा-नागासाकी पर एटम बम के साये थे। अंग-अपंग पंगु सी पलती सारी पीढ़ी जापानी, फिर भी हार न मानी सर से ऊपर- ऊपर था पानी। खड़ा हुआ फिर देश! बनाए कीर्तिमान विज्ञान के, हमने देखे बड़े हौसले छोटे से जापान के।
भारत से नेता होते तो सारा देश कहाँ होता? सायोनारा! शुद्ध बुद्ध का हर उपदेश कहाँ होता? होता कहाँ खिलौनों वाली जापानी गुड़िया का रूप, वह हाथों में पंखा झलती मुसकाती मदमाती धूप! अपनी बिगड़ी आप सँवारी बिना किसी अनुदान के। हमने देखे बड़े हौसले छोटे से जापान के।
फिर आया जलजला सुनामी ने ही ढाया घोर कहर, तट से कट कर सागर मचला, लहरें मचलीं शहर-शहर, जल से जाग उठा बड़वानल, धूँ-धूँ ज्वालामुखी जले, तहस-नहस हो गईं बस्तियाँ, आग उगलती हवा चले। अगन-पवन-जल दुश्मन हो गए आकाशी अरमान के फिर देखेंगे सबल हौसले, छोटे से जापान के।
सीखो, सबसे बड़े विश्व के प्रजातंत्र कुछ तो सीखो, जगद्गुरू भ्रष्टाचारों के महामंत्र! अब तो चीखो! बोलो जय-जयकार सुनामी झेल के भी हैं वे उत्साही, तुम विकास की पूंजी खाकर मुँह पर पोत रहे स्याही। वे निर्माणी जुट गए फिर से कर्मशील उत्थान के। जग देखेगा बड़े हौसले, छोटे से जापान के।