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शीतल मेहता
मुझे अपने स्पर्श का एहसास दे दो
मेरी घड़कनों को अपनी श्वास दे दो
नि:स्वार्थ नहीं है मेरी प्रीत तुम्हारे लिए
जो माँगा नहीं कभी तुमसे वह स्वार्थ दे दो
कोई मतलब नहीं मुझे तुम्हारे कल से,
जिसमें तुम ही तुम हो वह आज दे दो।
नज़रों की बेकरारी कैसे समझाऊँ तुम्हें,
बस एक बार इन्हें इनकी तलाश दे दो।
मत पूछना मेरे सपनों के बारे में कुछ,
अपने घर के आँगन में इन्हें पनाह दे दो।
ख़ामोश न रहना ज़माने के सवालों पर,
तन्हाई में चाहे नज़रों से जवाब दे दो।
ज़मीं हूँ मैं सबकुछ सहन कर लूँगी,
मुझे मेरे हिस्से का आकाश दे दो।
तुम्हें तो मिल गई हर मोड पर बहारें,
मुझे पतझड़ की सूनी साँझ ही दे दो।
धरती और गगन सा है अपना मिलन,
जानती हूँ फिर भी एक आस दे दो।
विरह में ही ग़ारत हुए हैं बरसों मेरे,
अब तो वह खिलता हुआ मधुमास दे दो।