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महापुरुषों को भी झुकना पड़ता है...

- डॉ. रामकृष्ण सिंगी

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कविता
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राम ने पारिवारिक कलह से क्षुब्ध होकर।
अंगीकार किया वनवास चौदह वर्षों का।।

पिता की आज्ञा का तो बस एक बहाना था।
परिवार को विग्रह से और भ्रातृप्रेम को बचाना था।।

वे ही राम पचड़े में पड़े आगे जाकर
सुग्रीव और बाली के, रावण और विभीषण के।

परिणति उभरी एक सर्वविदित कथा बनकर।
दोनों परिवारों पर घुमड़ा सर्वनाश घटा बनकर।।

* * * *

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कृष्ण पड़े कौरव-पांडवों के विवादों में।
शकुनि की कुटिल चालों में, दुर्योधनी प्रवादों में।।

सत्य को विजय दिलाना तो एक बहाना था।
विवादों के साथ आततायियों को मिटाना था।।

वे ही कृष्ण मिटा न सके यादवों के आपसी विवाद,
जो लड़ मरे आपस में, सत्ता के नशे में चूर-चूर।।

कृष्ण अंतत: निराश जा बैठे समाधिस्थ,
इस कुटिल संसार से बहुत दूर, बहुत दूर।।

* * * *

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बाली को धराशायी कर सीख दी क्रुद्ध राम ने।
पापी है वह जो भाई की पत्नी को कुदृष्टि से देखे।।
उसे मारना पाप नहीं, जरूरी है व्यापक हित में।

उन्हीं राम के आगे बाद में सुग्रीव ने,
रख लिया घर में तारा को, विभीषण ने मंदोदरी को।।

* * * *


महापुरुषों को भी झुकना पड़ता है नियति के आगे।
या अपने प्रिय पात्रों के हितों के पोषण के लिए।।

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