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मुझे इतना अकेला न बना

ज्ञानप्रकाश विवेक

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ज्ञानप्रकाश विवेक
मेरी औकात का ऐ दोस्त शगूफा न बना
कृष्ण बनता है तो बन, मुझको सुदामा न बना

वर्दियों की तरह निकला है पहनकर इनको,
अपने जख्मों का तू इस कदर तमाशा न बना

कोई चिट्ठी, न परिंदा न दरों पर दस्तक,
मेरे भगवान, मुझे इतना अकेला न बना

ये न हो कि तू किसी पत्थर में बदल जाए
इतना गहरा किसी दीवार से रिश्ता न बना

एक मौसम यहां बारिश का भी होता है 'विवेक'
अपना गत्ते का मकां इतना भी अच्छा न बना।

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