सावन की पहली फुहार सेकृपार्थ हो गया तन-मन, रिमझिमाती जब बूँद बनबरसे जो तुम गगन...मैं धरा तुम बिन अबली, जीती सकुचाती- संभली, आज क्यों अथाह बनउमड़ रहा मेरा मन...
तुम हो आकाश-विशाल,
मैं हूँ अविचल धरा
हम दोनों के प्रेम का
कठिन लगता है मिलन...
तुम्हारे इस स्पर्श से
पुलकित होते भाव नवीनतम
कैसे कहुँ तुमसे क्या मिला?
शब्द पड़ते हैं अब कम..