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मौन भाषा प्रेम की

ज्योति जैन

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कविता
ND
निष्‍कपट, निष्‍पाप
प्रेम की
परिभाषा
तुम बता गए,
जाने-अनजाने
द्वार पर मन के तुम
कब आ गए!
पहली बार भी
अजनबी तुम,
कभी नहीं मालूम हुए,
सदियों से जो
निभा रहे थे,
रिश्‍ते सम्‍मुख आ गए।
नजरों ने नजरों को
छू लिया,
कहने की कुछ बात
नहीं थी,
मौन प्रेम की भाषा होती
नजरों से तुम
सिखा गए।

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