-आलोक श्रीवास्तव
यह एक ऐसा युग है
जिसकी पूर्वकल्पना के वृतांत
किसी पुराग्रंथ में न थे
जिसका साक्ष्य किसी आप्तवाक्य में न था
विवेक के खामोश हो जाने
साहस के टूटने के ब्यौरों से भरा यह समय
दरअसल उतना बुरा न था
बात सिर्फ इतनी थी कि
वह कुर्बानी माँग रहा था
कीमत चाहता था
और हम छोटी-छोटी चालाकियों से
जिंदगी के मसलों के हल खोज रहे थे
पर सरोकार हमारा क्रांति से था
यह इतिहास की विडंबना का युग था
हमने आँखें बचाईं
रास्तों से कतराए
अपने ही विचारों के खिलाफ
समूचा एक जीवन जिया
और समय को कोसते रहे
जाने किन अदृश्य शक्तियों के खिलाफ
हमारा अमूर्त गुस्सा था
जबकि दुश्मन हर बार
हमारी बगल में था
हर बार हमारी पहुँच में
हमारे निशाने पर
मगर बात सिर्फ इतनी थी कि
हम समूचा एक युद्ध जीतना चाहते थे
बगैर लड़े।