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यहीं कहीं था घर

सुधा अरोड़ा

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सुधा अरोड़ा
ND
ज्यादातर घर
ईंट गारे से बनी दीवारों के मकान होते हैं
घर नहीं होते ...

जड़ों समेत उखड़कर
अपना घर छोड़कर आती है लड़की
रोपती है अपने पाँव
एक दूसरे आँगन की खुरदुरी मिट्टी में
खुद ही देती है उसे हवा-पानी, खाद-खुराक
कि पाँव जमे रहें मिट्टी पर
जहाँ रचने-बसने के लिए
टोरा गया था उसे !

एक दिन
वहाँ से भी फेंक दी जाती है
कारण की जरूरत नहीं होती
किसी बहाने की भी नहीं
कोई नहीं उठाता सवाल
कोई हाथ दो बित्ता आगे नहीं बढ़ता
उसे थामने के लिए...

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ND
वह लौटती है पुराने घर
जहाँ से उखड़कर आई थी
देखती है -उखड़ी हुई जगह भर दी गई है
कहीं कोई निशान नहीं बचा
उसके उखड़ने का...

फिर से लौटती है वहीं
जहाँ से निकाल दी गई थी बेवजह
ढूँढ नहीं पाती वह जगह ,
वह मिट्टी, वह नमी, वह खाद खुराक !

ताउम्र ढूँढती फिरती है
ईंट गारे की दीवारों के बीच
यहीं कहीं था घर ....

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