याद आ जाते हो अक्सर...छत की मुंडेर पर बैठी देखती हूँ जब बारिश की बूँदों में छपछपाते तुमयाद आ जाते हो अक्सर मेरे इठलाते बचपन... छिपते-छिपाते कापियों से फाड़कर कागजो की कश्तियों में तैरते तुम उल्लास बन, जब भी गिरती हैं बूँदेयाद आ जाते हो अक्सरमेरे इठलाते बचपन...
घर का किवाड़ खोल,
दबे पाँव, चुपके-चुपके
जब निकलते हो घर से,
फिर मचाते हो उधम,
लौटते हो कुछ कि जैसे
मृदा में सनता हो बदन,
याद आ जाते हो अक्सर
मेरे इठलाते बचपन...
माँ की उस चपत में,
आँख मींचे तुम खड़े,
फिर तुम्हारा रुदन-क्रंदन,
आह वो मीठा सा भोलापन,
याद आ जाते हो तुम अक्सर
मेरे इठलाते बचपन...