लक्ष्मीनारायण खरे
शब्दों के उपवन में तुम,
गुंजन भँवरे-सा करते रहे
निःशब्द मौन की अनुभूति मगर
मन की मेरी समझ न सके।
तर्कों से आहत
भावनाएँ मेरी करते रहे
शोर में समाज के
स्वर मेरा तुम सुन न सके।
इमारतों के आकर्षण से
चुम्बक बन खिंचते रहे
आत्मीयता के घर में मेरे
कदम मगर तुम रख न सके।
भौतिकता के खंजर से
नैतिकता को बधते रहे
लगे बुझने भी अब आस्था दीप
प्रज्वलित इन्हें तुम रख न सके।
उपेक्षाओं के चुभोकर नश्तर
छलनी हृदय तुम करते रहे
खुद पी गए हम आँसू अपने
नयन तुमसे मगर कुछ कह न सके।
उसी हाल में बैठे अब भी
राह तुम्हारी तकते रहे
हम न भूले तुम्हें आज भी
याद मगर तुम रख न सके।