सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'
ओह मेरे
प्रेम के हवामहल
विश्वसनीय हो तुम
जैसे पतझड़ और प्रकाश
मदमस्त मेघों से उमड़ता ऐच्छिक आकाश
मेरे तन में
प्रवेश कर क्यों हलचल मचाते
कोंपलों-सा फूट जाना चाहते क्यों
पयोधर बनकर मुक्त करते
दुग्ध की बूंदें
चयन करते
लू की गर्मजोशी
श्वेत चुनरी हिमकणों की
पहनाते मुझे
बिखरकर फैल जाते
यादों के हरसिंगार
वतन के हाल सुनते
चाँदनी के नूपुरों से
आहटों में
जोहता मैं बाट तेरी
जो अभी है साथ मेरे हलचलों में
उन उमंगों के सदा दीपक जलाता।
आलाप ले मैं द्वार तेरे खटखटाता
आँधियों सा उमड़कर
तूफान गाता
अगर तुम्हारे द्वार
न खुलते अचानक
उमड़ती नदी ले तुमको बहाता
कल्पना से
मन कहाँ भरता हमारा
साथ रहता जो सदा अपना कहाँ
यथार्थ के आँचल तले
सपना कहाँ
स्मरण रह पाता नहीं
न भूल पाता
पुस्तकों के सम्पुट बन
दबा दिया जाता मोरपँख।