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रावण था महिमामय 'विलेन'?

-डॉ. रामकृष्ण सिंगी

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रावण
जी हां, रावण के थे दस सिर और प्रकटत: दस चेहरे।
उसकी स्वर्ण लंका पर रहते थे सदा महाबलियों के पहरे॥

उसके दस सिर उसकी दस प्रतिभाओं के थे गुणमय प्रतीक।
रावण था एक दुर्दम्य शक्ति और एक शासक निर्भीक॥

वह था अस्त्र-शस्त्र पारंगत, अनेक शास्त्रों का ज्ञानी।
प्राकृतिक शक्तियों पर काबू कर रखने वाला विज्ञानी॥

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वह संगीतज्ञ (वीणावादक) था, नृत्य कला पारखी था।
वह महारथी था, सैन्य संगठक, विजयी व्यूहकार भी था॥

उसका विरोध था देवों से, 'रक्ष-संस्कृति' का वह प्रबल प्रवर्तक था।
वह था अनन्य भक्त शिव का, उनके आगे नतमस्तक था॥

वह रसज्ञ था, रणनीतिकार, घनघोर आत्मविश्वासी था।
जीवन को परिपूरित जीने की चाह में भले 'विलासी' था॥

उसके पराक्रम का प्रभाव दक्षिण भारत तक छाया था।
लंका से लेकर यान स्वयं, सीता को हरने आया था॥

कायर देवों पर विजयों ने उसके अहंकार को बड़ा किया।
नियति का कुचक्र ही था जिसने उसे राम के सामने खड़ा किया॥


राम-विभीषण की युति से विजयी हुई वानरी सेन।
फिर भी इतिहास में अंकित है- 'रावण' एक महिमामय 'विलेन' ॥

पर रावण न बलात्कारी था, भ्रष्टाचारी न घोटालेबाज।
और न वह षड्यंत्रकारी था जिनसे पीड़ित आज समाज॥

आज हैं हर एक क्षेत्र में रावण, घूसखोर, पाखंडी, चोर।
हरण कर रहे आज राष्ट्र की शांति-सम्पदा चारों ओर॥

उस पराक्रमी के पुतले को भले हम प्रतिवर्ष जलाएंगे।
पर इन छद्म रावणों पर क्या कभी काबू कर पाएंगे?

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