त्रिलोक महावर
तब और अब
कस्बा छोड़कर गया था
शहर मिला है
कस्बे में मैं जाना जाता था पिता के नाम से
फिर दोनों एक-दूसरे के नाम से
शहर में पहचान गुम होने लगी है
गनी नहीं रहे
सादिक ख़ान हैडमास्टर का घर
तब्दील हो गया कॉम्प्लेक्स में
घर के सामने का नीम
ठूँठ भर रह गया
जिसकी छाँव में पड़ा था
कभी प्रेम का पहला पाठ
कदम के पेड़ के पीछे
नारियल के दरख़्त पर
सूरज सुस्ताता था
शाम को घर लौटने से पहले
वहाँ अब है कांक्रीट का जंगल
ट्यूब लाईट की जगह
सोडियम वैभर लैम्प ने ले ली है
सड़कें चौड़ी हो गई हैं
पर लोग तंग दिल हो गए हैं।
साभार : संबोधन