वह ऋतु है वसंत की, कभी ठंडी कभी गर्म, कभी झूम पड़ती रिमझिम सावन-सी, कभी खामोश रहती सर्द रातों-सी, सदा खिली रहती फूलों में बहारों-सी , तितली-सी मंडराती हर क्षण का स्वागत करती, कभी घनघोर काली घटा-सी बिगड़ पड़ती, अगले ही पल सूरज की चमक आँखों में भर लेती, स्वयं प्रकृति की अदभुत कृति है वह, न छल,न छलावा,खुशियों का है पिटारा, जितना समझो उतनी ही सरल, अल्हड़ बहती नदी-सी नट-नर्तकी, कई गुणों से सजी है वह , स्वयं ब्रह्मा को जिस पर नाज है, ऐसी अनोखी परी है वह, वह ऋतु है वसंत की।