- जयशंकर प्रसाद
जो सर्व व्यापक तऊ सबसे परे हैं।
जो सूक्ष्म हैं पर तऊ बसुधा धरे हैं।
जो शब्द में रहत शब्द न पार पावै।
ताकी महान महिमा कवि कौन गावै॥
जो भानू मध्य निज भासत ओज धारे।
शीतांशु जासु लहि कान्ति प्रभा पसारे॥
जाको सुगन्ध मलयानिल पाइ डोलै।
ताके महान गुण-ग्रंथिहिं कौन खोलै॥
जाके कृपा कणहिं पाइ तरंगशाली।
गम्भीर गर्ज्जन करै निधि फेन माली॥
कैसो अनन्त वह देव दयालु सोहै।
जो बैठि के सुमन मन्दिर माँहि मोहै॥
जो नित्य सौरभ सने मणि-पद्मवासी।
जो हंस मानस सरोवर को विलासी॥
जो पुण्य छीर पय पावन को विचारै।
आनन्द के तरल वीचिन में विहारै॥
जो कल्पवृक्ष नित फूलत मोद भीने।
जो देत स्वच्छ मंगल हैं नवीने॥
संसार को सदय पालत जौन स्वामी।
वा शक्तिमान परमेश्वर को नमामी॥