अनंत में अवस्थित असंख्य आकाशगंगाओं का प्रकाशअनगिनत वर्षों के अति उत्साह सेकिसके दर्शनों की अभिलाषा लिए हुएकिससे मिलने को आतुर था मनढोलक की थाप पर, मृदंग की ताल पर,मंद हवा के झोंके जैसे मुझे लुभाताकौन चला आ रहा है...एक निशा के गुजर जाने के बाद,सामने सुबह को साथ लिए,पूजा की थाली के फूलों सा महकता महकाता कौन चला आ रहा है दीवारों पर कुंकु के छापे देतामाँग में दमकते सिंदूर सा चमकताये कौन चला आ रहा है -
ये कौन चला आ रहा है
मैंने हौले से जब खिड़की खोली
सामने खड़ा था ससुराल का पहला दिन ।
साभार : शुभ तारिका