उसने बस इतना चाहा कि एड़ी उचका बादलों को छू ले नारियल की फुनगी पर चोंच रगड़ ले या फिर बिजली की चमक को अँजुरी में भर जमीन पर उतर आए वह उड़ी, किन्तु पंखों पर नहीं बादलों पर भी नहीं बिजली पर भी नहीं बिजली की धार पर भी नहीं धुनी हुई रूई की तरह उसकी देह का रेशा-रेशा हल्का हो गया फिर तार-तार होते हुए धागे में बदल गया फूल-पत्तियों की बुनावट में बुनती हुई वह आँगन में पसर गई उसकी चाहतें कसीदे में बदल गई। 2 बीज से निकली रेशमी जड़ भीतर तक चली आई कोख को खुजला कर जम कर बैठ गई तो वह चाहने लगी कि पेड़-पौधे उस पर घिरे जाएँ कीड़े सतह कुरेदने लगे साँप-बिच्छू सुरंग बना लें जंगली भैंसे के सींग की नोक तार-तार कर दे भीतरी गुठलियों को नरक से निकलने वाली सिसकियाँ स्वर्ग तक पहुँच जाएँ बन जाए वह जमीन बाहर से भीतर तक। 3 वह आसमान थी फिर जमीन बनी एक वक्त आया कि लहरें हिलोड़ने लगीं सागर बन पीने लगीं घूँट-घूँट पहली आयी धीमे से खटखटाया वह जागी, मुस्काई दूसरी आ पहुँची फिर तीसरी, फिर चौथी, पाँचवीं..... उफ! लहरें ही लहरें एक के बिलाते दूसरी दूसरी के बाद तीसरी सागर बनी वह औरत जूझ रही है लहरों से देह को बारूद की सुरंग पर रख मानों जर्रा-जर्रा उड़ा देगी उसका होठों को चबाता दर्द रेशा-रेशा कर समाता गया अंधकार में डूबती वह न बादल है न जमीन और न सागर न यशोधरा, न कैकेयी और न मंथरा न माँ, न पत्नी, न बेटी बस लहर दर लहर दर्द से जूझती रेत के कणों में मोती टटोलती सागर बन गई औरत।