कर दें चाहे नामंजूर सुन तो लें फरियाद हुजूररोटी सेंक रहा है कौनसारा शहर बना तंदूरलपटों में लिपटा हर दृश्यआँखें धुआँ-धुआँ बेनूरपन्ना-पन्ना लहूलुहान अखबारों को रखना दूरझूठ कि जैसे तानाशाहसच जैसे बंधुआ मजदूरइसका कोई नहीं इलाज स्वाभिमान ऐसा नासूरआसमान पर चढ़ा दिमाग दिल का शीशा चकनाचूरसाबित हो न भले ही जुर्ममगर मिलेगी सजा जरूर सुबह-शाम इतना अपमानवह भी यारों बिना कसूरखूब हुआ भैया मतदानकितने गाँव हुए मशहूर
आखिर वो हैं नए अमीर
कुछ तो होगा उन्हें ग़रूर
सबके दिल में भारी खौफ़
सब कितने बेबस मजबूर
राही को समझाए कौन
कविताई है सिर्फ फितूर ।
साभार : समकालीन साहित्य समाचार