अनुप्रिया
ना मैं
इन्द्रधनुष की सतरंगी डोर
जिससे बँधे हैं
जिन्दगी के सारे रंग,
ना मैं
नीले आकाश का विस्तार
जिसकी बाँहों में
खिलते चाँद-सितारे
ना मैं
पंखों की ऊँची उड़ान
कि छू सकूँ
बादलों की गहरी बेचैनियाँ
पर हाँ
अनचाही ही सही
तुम्हारे भीतर उग आई
सोंधी सच्ची आँच हूँ
दिपदिप जलने को प्रतिबद्ध।