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स्मृति

रश्मि रमानी

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हमें फॉलो करें हिन्दी प्रेम कविता
सिर्फ एक बार नहीं
बार-बार आऊंगी तुम्हारे पास
आते हैं जैसे दिन-रात
कभी-कभी नहीं
अक्सर मिल जाया करूंगी
मिल जाते हैं जैसे
खुशमिजाज अजनबी
किसी अनजान जगह के उबाऊ सफर में
पहुंच जाऊंगी
ठीक समय पर ठीक उसी जगह
जहां होओगे
सिर्फ तुम।
तुम्हारी उदासी और गहरी खामोशी
किसी बेनाम खुशबू को महसूसता
तुम्हारा वजूद याद करेगा
बरसों पहले बीते हुए उस पल को
जब किसी कुंवारी लड़की के थरथराते होठों को चूमते
तुमने महसूस की थी
उसकी सांसों की सुगंध
सादा पानी
पहुंचता है जैसे पेड़ की जड़ में
और बदल जाता है फलों की मिठास में
बारिश की पहली बूंद की तरह
गिरूंगी तुम्हारे होठों पर
उतर जाऊंगी भीतर तक
अनोखा स्वाद बनकर।
सूरज डूबने के बाद
जितनी देर होती है क्षितिज पर लाली
सुबह होने पर
जब तक पत्तियों पर ठहरती है ओस
दिन और रात के बीच
जितनी देर शाम
तुम्हारी जिंदगी में रहूंगी मैं
भोर के मीठे सपने की परछाईं बनकर
जा‍ते-जाते भी थोड़ी-सी ही सही
पर
बची रहूंगी कुछ इस तरह
नदी की रेत में जैसे होती है नमी।

जाने-अनजाने ही किताबों में दबे-सूखे फूल
या कोट की जेब में
चलन से बाहर हो चुके सिक्के की तरह नहीं
मैं तुम्हें मिल जाया करूंगी यहां-वहां
वसंत की पहली कोंपल
या टकसाल से निकले नए सिक्के की तरह
जब भी गुजरोगे तुम
िसी निर्जन पगडंडी पर
सुनोगे जंगल से आती हवा में समाया संगीत
सृष्टि के आदिम स्तर
याद आऊंगी मैं तुम्हें बार-बार
बीते दिनों की स्मृति बन कर।

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